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| ghazal |
جب ترا حکم ملا ترک محبّت کر دی
دل مگر اس پہ دھڑکا کہ قیامت کر دی
تجھ سے کس طرح میں اظہار محبّت کرتا
لفظ سوجھا تو معانی نے بغاوت کر دی
میں تو سمجھا تھا کہ لوٹ آتے ہیں جانے والے
تو نے جا کر تو جدائی مری قسمت کر دی
مجھ کو دشمن کے ارادوں پہ پیار آتا ہے
تری الفت نے محبت مری عادت کر دی
پوچھ بیٹھا ہوں تجھ سے ترے کوچے کا پتہ
تیرے حالات نے کیسی تیری حالت کر دی
کیا ترا جسم تیرے حسن کی حدّت میں جلا
راکھ کس نے تری سونے کی سی رنگت کر دی
احمد ندیم قاسمی
जब आपकी आज्ञा दी गई, तो तुर्कों को प्यार हो गया
दिल, हालांकि, जी उठने पर धड़कता है
मैं तुम्हें कैसे प्यार करूँ
जब शब्द को समझा गया था, तो अर्थों में विद्रोह हुआ
मैंने सोचा था कि लौटेगा
जब तुम गए, तो तुम मरने के लिए किस्मत में थे
मैं दुश्मन के इरादों से प्यार करता हूं
ट्राई उल्फत ने प्यार को एक आदत बना लिया
मैं आपसे कोच का पता पूछ रहा हूं
आपकी स्थिति आपको कैसी लगी?
क्या आपका शरीर आपकी सुंदरता की गर्मी में जलता है?
गीले सोने जैसी राख को किसने पेंट किया?
अहमद नदीम कासमी

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